Geeta से सीखें Decision Making के 5 Simple Rules



 

Geeta से सीखें Decision Making के 5 Simple Rules



हम सबको रोज़मर्रा की ज़िंदगी में छोटे-बड़े कई फैसले लेने पड़ते हैं — कभी करियर से जुड़े, कभी रिश्तों से, तो कभी अपने जीवन के मकसद से। ऐसे में अगर सही समय पर सही निर्णय लेना आ जाए, तो जिंदगी काफी आसान हो सकती है।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हजारों साल पुरानी भगवद गीता हमें आज के मॉडर्न समय में भी decision making सिखा सकती है? महाभारत के युद्ध के मैदान में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया, उसमें जीवन के हर पहलू के लिए गहराई से समाधान छिपे हुए हैं।

चलिए जानते हैं गीता से सीखने लायक 5 ऐसे सरल नियम, जो आपको सही निर्णय लेने में मदद करेंगे।


1. धर्म का पालन करो – सही क्या है, पहले ये सोचो

गीता में कहा गया है:
"स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।"
(अध्याय 3, श्लोक 35)

इसका मतलब है कि अपने कर्तव्य को निभाना ही सबसे श्रेष्ठ है, चाहे उसमें कितनी भी मुश्किल क्यों न हो।

जब आप किसी निर्णय के सामने खड़े होते हैं, तो सबसे पहले सोचें – क्या ये मेरे कर्तव्य के अनुसार है? क्या ये सही है?
दूसरों की नकल या समाज के दबाव में आकर लिए गए फैसले अक्सर लंबे समय में नुकसानदेह होते हैं। इसलिए अपने अंदर झाँककर देखिए कि क्या आपके फैसले में नैतिकता और सच्चाई है। अगर है, तो वह निर्णय सही दिशा में होगा।


2. फल की चिंता मत करो – बस कर्म करते जाओ

गीता कहती है:
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।"
(अध्याय 2, श्लोक 47)

अक्सर हम कोई निर्णय लेने से डरते हैं क्योंकि हमें उसके रिजल्ट का डर होता है।
क्या होगा अगर गलत हो गया? क्या लोग क्या कहेंगे?

गीता हमें सिखाती है कि हमें सिर्फ अपने कर्म पर ध्यान देना है, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए।
जब आप निर्णय लेते हैं, तो सोचिए – क्या मैं इस फैसले में पूरी मेहनत और ईमानदारी से लग सकता हूँ?
अगर हाँ, तो आगे बढ़िए। रिजल्ट अपने आप अच्छे होंगे।


3. स्थिति को स्वीकार करो – तब ही साफ सोच पाओगे

गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा:
"शोक न करो, युद्ध करो।"
(अध्याय 2)

अर्जुन जब युद्ध से भागने का सोच रहे थे, तो कृष्ण ने उन्हें समझाया कि पहले तुम स्थिति को स्वीकार करो। जब तक हम सच का सामना नहीं करते, हम क्लियर माइंड से कोई भी फैसला नहीं ले सकते।

अगर आप किसी कठिन परिस्थिति में हैं, तो सबसे पहले उसे स्वीकार करें। भागने या डरने की बजाय शांति से सोचें – अब इस स्थिति में सबसे अच्छा कदम क्या हो सकता है?
सच्चाई को स्वीकार करना decision making का पहला स्टेप है।


4. भावनाओं में बह कर फैसला मत लो

भावनाएँ ज़रूरी हैं, लेकिन अगर आप पूरी तरह से इमोशंस के बेस पर निर्णय लेंगे, तो वो अक्सर गलत हो सकते हैं।

गीता में कहा गया है:
"असंयत आत्मा न बुद्धिः, न च ध्यानम्।"
(अध्याय 2)

मतलब अगर मन और आत्मा अस्थिर हैं, तो बुद्धि काम नहीं करती।

इसलिए जब कभी भी आप गुस्से में हों, बहुत दुखी हों या बहुत ज्यादा उत्साहित हों – उस समय कोई बड़ा फैसला न लें।
थोड़ा रुकिए, शांत होइए, और फिर सोचिए। ऐसा करने से आप ज्यादा समझदारी से निर्णय ले पाएंगे।


5. स्वयं को जानो – अपने लक्ष्य को समझो

गीता में बार-बार आत्म-ज्ञान की बात की गई है।
जब आप खुद को समझने लगते हैं – आपकी शक्तियाँ, आपकी सीमाएँ, आपके लक्ष्य – तब आप सही फैसले लेना सीख जाते हैं।

जब भी कोई बड़ा निर्णय लेना हो, खुद से पूछिए –

  • क्या ये फैसला मुझे मेरे लक्ष्य के करीब ले जा रहा है?

  • क्या ये मेरी पहचान से मेल खाता है?

अगर जवाब हाँ है, तो वह निर्णय आपके लिए सही है।


निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता कोई सिर्फ धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि एक जीवन मार्गदर्शिका है। उसके अंदर छिपे ज्ञान से हम आज की जटिल दुनिया में भी सही दिशा पा सकते हैं।

जब आप अगली बार किसी मुश्किल निर्णय के सामने खड़े हों, तो इन 5 बातों को याद रखिए:

  1. सही क्या है, पहले सोचो।

  2. फल की चिंता छोड़ो, कर्म पर ध्यान दो।

  3. सच को स्वीकार करो।

  4. भावनाओं में बहो मत।

  5. खुद को जानो।

फैसला तभी सटीक होगा जब वह समझदारी, सच्चाई और आत्मज्ञान के आधार पर लिया जाए।


अगर आपको ये ब्लॉग पसंद आया, तो शेयर करें और बताइए – गीता की कौन सी सीख आपको सबसे ज्यादा प्रेरित करती है?

📌 Tag करें, शेयर करें और खुद में बदलाव लाएं!

#TheMahendrashow #SystemBadlo #KhudKoBadlo #GeetaSeGyaan #Motivation #HindiBlog #SelfTransformation

Youtube  Instagram Facebook

Post a Comment

Previous Post Next Post